कुछ यूं ही #10

मैं जो बिखरा हूँ टूटकर तो तुझमें रंग आये हैं
मैंने अपनी मौत में भी तुझे आबाद किया है।

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अतिरथी

चट्टानें हिल उठे नाद से

मैं वो वज्र अरिहर हूँ

ठोकर खाऊं चोट तुम्हे दूँ

मैं दृढ़चित्त हूँ पत्थर हूँ ,

मृत्यु के भय से भी अधिक

भयंकर है यदि कुछ जग मे

टकराओगे तो पाओगे

मैं उससे भी बदतर हूँ।

दिल से

तुझे कह दूं मैं, नूर ए इलाही

या बहते हुए दरिया की रवानी कहूं

तुझे कह दूं कुरान ए पाक की आयत

या अहसास कोई बेहद रूहानी कहूं

तुझे कह दूं नियामत ज़िन्दगी की

या मुझे बख्शी, खुदा की कोई निशानी कहूं

कम हैं सारी दुनिया के लफ्ज बयां करने को तुझे

अब इससे ज्यादा ए मेरे दिलबर मैं ओर क्या कहूं
जी करता है तेरे अक्स के नक्से गढ़ दूं

जी करता है तेरे हुस्न के खुतबे पढ़ दूं

पर एक दिक्कत है, कैसे मैं उसे पार करूं

तू जब सामने होती है तो, अल्फाज नही बनते

बस दिल करता है कि जी भर के तेरा दीदार करूं

हुस्न-ए-सनम

तेरा ही अक्स उनकी आंखों में आया होगा

खुदा ने धरती और चाँद को जब बनाया होगा

क्या हूरो की बिसात तेरे हुस्न के आगे

फीका है नूर-ए खुदा भी मुक़ाबले में तेरे

तुझे मांगा है हर दुआ सब नमाजों में मैंने

मेरी किस्मत में लिख जा अब तो ए आशिक़ मेरे

हुस्न तेरे सा था ना पहले इस जहाँ में कोई

न तेरे जाने के बाद ही कोई आया होगा

क्या किस्से कहूँ मैं जमीं और आसमां के

तूने जन्नत में भी कहर बरपाया होगा

वो

ये जमीं ये आसमां ये चाँद ये तारे

ये दुनिया बहुत नूरे-सूरत बनायी

रूहानी था बेशक ये सब कुछ बहुत ही

मगर उसके दिल को तसल्ली न आयी

नक्स-ए-तजल्ली तब आया जेहन में

जब तस्वीर तेरी उभर कर के आयी

सारी खुशियां थीं तूने समेटी हुई

अपने आगोस में थीं लपेटी हुई

तू मौसम, तू अहसास, तू रंग लेकर आई

तू अपने होंठों पे मुस्कान संग लेकर आई

अब कायनात में कुछ चहलकदमी है

नयी सी एक आबो हवा छा गयी है

एक अरसे से हम बुत बनके खड़े थे

तू आयी तो हममें भी रूह आ गयी है